Sunday, 27 April 2014

Pyar Ki Parikashtha

प्यार की परिभाषा को समझते - समझते,
ना जाने कब मैं खुद प्यार को परिभासित कर गया ,
मुझे तो पता ही नहीं था की क्या प्यार,
ना जाने मैं कैसे किसी से प्यार कर गया।

उसे देखा नहीं आज तक , ना कभी हूं उससे मिला,
बस की उससे बात , और न हुआ  हमारे बीच मुलाक़ातों का सिलसिला ,
बातों -बातों में ही न जाने कैसे उसकी सच्चाई परख गया मैं ,
उसी सच्चाई आधार पे ना जाने कैसे प्यार कर गया मैं।

उसकी आवाज़ में एक मनभावन मिठास थी,
उसके दिल में मेरी फिक्र नुमाई एहसास थी,
वो भी मुझे बिना देखे , बिना मिले , समर्पण को तैयार थी,
पर क्या उसे भी हो गया है मुझसे प्यार, इस बात से वो भी अनजान थी।

उसे प्यार से अनजान देख, मैं सिहर उठा था,
मेरे प्रति वो पड़ रही थी असमंजस में, इसे देख में कहर उठा था,
में तो सदा उसे खुश देखना था चाहता ,
मेरा प्यार उसके ख़ुशी के आड़े आये, ऐसे बंधन में नहीं था उसे बांधना चाहता।

उस दिन से लेकर आज-तक , उससे में अछि दोस्ती  हूं निभा रहा ,
उसके दर्द में खुदको, और अपनी ख़ुशी में उसको , सरीक किये जा रहा,
वो खुश है की उसे मेरे जैसा एक अनोखा दोस्त मिला,
जिससे कहती है वो की उसका दिल मिला।

अपने प्यार को दिल में दबाये , में उसे खुश रखता हूँ ,
दोस्त हूँ , दिल में है भले प्यार, पर दोस्ती की मर्यादा का पालन करता हूँ,
प्यार केवल किसी को पा लेने की सौगात नहीं,
प्यार की परिकाष्ठा को परिभासित करने की भी कोई सीमा नहीं।  

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