Saturday, 3 May 2014

Khamoshi Se Dar

अकेलेपन से हुई दोस्ती तो ख़ामोशी ने डरा दीया,
परछाई तो थी साथ, पर उसकी भी ख़ामोशी ने डरा दिया,
जिंदगी में सब कुछ पाया मैंने, पर किसी  अपने कि चुप्पी ने डरा दीया,
मैं सुनना चाहता था बहुत कुछ पर उसकि ख़ामोशी ने मुझे हरा दिया।

मैंने रख दी उसके समकक्ष अप्ने दिल कि बात,
यहाँ तक कहा कि तेरे बिना नही अच्छे मेरे हालात,
फिर भी रही वो चुप अपनी मजबूरियों को जिम्मेदार ठहराते हुए,
ना कुछ बोली ना मुह खोलि, मेरे प्यार को ठुकराते हुए।

मेरी सुन के दिल कि बात वो कुच्छ मना कर गयी मुझे,
मजबूरियों के बहाने जड़ गयी मुझे,
मेरी चाहत तो केवल उसकी चाहत पाने कि थी,
उसकी छवि अपने दिल मे बसाने कि थी।

सुन कर उसने अनसुना कर दिया मुझे,
मुझे ठुकराने का कारण भी ना बताया मुझे,
उसकी खोमोशी को उसका इंकार समझ छोङ आया उसे,
उसकी खुशी मे हि अपनी खुशि क एहसास दिला आया उसे।

पर अब ना जाने क्योँ खुद खामोश रहने को जी करता है,
किसी के भी अपनेपन से सब्से जादा डर लगता है,
अकेले अपना जीवन मैं फिर भी जी सकता है,
लेकिन सबसे जादा मैं ख़ामोशी से डरता हूं। 

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